Gurudev Rabindranath Tagore: गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की जीवनी

भारत के  पहले नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का जीवन परिचय: Biography of India's first Nobel laureate Gurudev Rabindranath Tagore


हर साल 7 मई को रविंद्रनाथ टैगोर जयंती के रूप में मनाया जाता है. आज, 7 मई को, भारत के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर की 160 वीं जयंती है. उनका जन्म 7 मई, 1861 को कोलकाता के जोरसंको हवेली में हुआ था. रवींद्रनाथ टैगोर जयंती बंगाली महीने के 25 वें दिन बोइशाख में पड़ती है, बंगाली कैलेंडर के अनुसार, टैगोर का जन्म वर्ष 1268 में हुआ था. रवीन्द्रनाथ टैगोर जयंती या रवीन्द्र जयंती दुनिया भर में बंगाली समुदाय के लिए एक सांस्कृतिक उत्सव है. रविंद्रनाथ टैगोर कवि होने के साथ संगीतकार, चित्रकार और लेखक भी थे. बहुमुखी प्रतिभा के धनी टैगोर ने गीतांजलि की रचना की जिसके लिए 1913 में इन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया. भारत के राष्ट्रगान, टैगोर के लेखक को गुरुदेव, कबीगुरु, और बिस्वाकाबी के नाम से भी जाना जाता है. रवींद्रनाथ टैगोर न केवल साहित्य में, बल्कि कई लोगों के जीवन में एक प्रेरणादायक व्यक्ति रहे हैं.


Gurudev Rabindranath Tagore: गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की जीवनी
भारतीय राष्ट्रगान के रचयिता, मानवतावादी विचारक, विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार,
दार्शनिक और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर जी की जयंती पर उन्हें कोटि कोटि नमन


उनके जैसा दोबारा फिर कोई ‘और’ ना हुआ,

बहुतों ने लिखा लेकिन कोई ‘टैगोर’ ना हुआ.


गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर का जीवन परिचय | Rabindranath Tagore Biography Jeevan Parichay

(7 मई 1861–7 अगस्त 1941)

गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई को 1861 को पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के मशहूर जोर सांको भवन में हुआ था. इनके पिता का नाम देवेन्द्रनाथ टैगोर था, जो कि ब्रह्म समाज के नेता थे और माता का नाम शारदा देवी था. रवींद्रनाथ अपने माता-पिता की तेरहवीं संतान थे, वे अपने भाई-बहन में सबसे छोटे थे. बचपन में उन्‍हें प्‍यार से ‘रबी’ बुलाया जाता था. उन्होंने अपनी माँ को खो दिया जब वह बहुत छोटे थे, उनके पिता एक यात्री थे और इसलिए उन्हें ज्यादातर उनके नौकरों और नौकरानियों ने पाला. 1883 में उनका विवाह मृणालिनी देवी के साथ हुआ. सन् 1901 में शांति निकेतन की स्‍थापना कर गुरु-शिष्य परंपरा को नया आयाम दिया.

इन्हें बचपन से ही गायन, कविता और चित्रकारी में रुचि थी. साथ ही अध्यात्म में भी अगाध स्नेह था. आठ वर्ष की उम्र में उन्‍होंने अपनी पहली कविता लिखी, सोलह साल की उम्र में उन्‍होंने कहानियां और नाटक लिखना प्रारंभ कर दिया था. इन्होंने अपने जीवन काल में कई ऐसी रचनाएं कीं, जिनसे इनकी पहचान न केवल देश में, बल्कि विदेशों में भी बनी. इन्हें असाधारण सृजनशील कलाकार माना जाता है. उन्हें आमतौर पर 20वीं शताब्दी के शुरुआती भारत के उत्कृष्ट रचनात्मक कलाकार के रूप में भी माना जाता है. 


गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की शिक्षा | Ravindranath Tagore Education


इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कोलकाता के सेंट जेवियर स्कूल से पूरी की. इसके बाद पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर की इच्छा को पूरा करने के लिए बैरिस्टर बनने के लिए, 1878 में उच्च शिक्षा के लिए लंदन गए. उन्हें स्कूल लर्निंग में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी और बाद में उन्होंने कानून सीखने के लिए लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में दाखिला लिया लेकिन उन्होंने इसे छोड़ दिया और शेक्सपियर के विभिन्न कार्यों को खुद ही सीखा. उन्होंने अंग्रेजी, आयरिश और स्कॉटिश साहित्य और संगीत का सार भी सीखा. प्रकृति से अगाध स्नेह रखने वाले गुरुदेव को लंदन में जरा भी मन नहीं लगा और किसी तरह बैरिस्टर की पढ़ाई अधूरी छोड़कर स्वदेश लौट आए.


गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचनाएं | Compositions of Gurudev Rabindranath  Tagore


गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर भारतीय साहित्य के उज्जवल नक्षत्र हैं। उनका शांत अप्रतिम व्यक्तित्व भारतवासियों के लिए सदैव ही सम्माननीय रहा है. वे न सिर्फ महानतम कवि थे बल्कि चित्रकार, दार्शनिक, संगीतकार एवं नाटककार के विलक्षण गुण भी उनमें मौजूद थे. उनकी रचनाओं से बंगाल संस्कृति पर विशेष प्रभाव पड़ा.

रबींद्रनाथ टैगोर की विरासत और बंगाली और अंग्रेजी साहित्य के क्षेत्र में योगदान को उनके सम्मान के नाम पर देखा जा सकता है. टैगोर को लोकप्रिय रूप से बंगाल के बार्ड के रूप में जाना जाता था और उन्हें उनके संवेदनशील और सुंदर कविता के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता था, जिसका जादुई स्पर्श होता है. वे बंगाली पुनर्जागरण के प्रतिपादक थे जिन्होंने बंगाली कला का आधुनिकीकरण किया और आज तक उनकी सभी कविताएँ, उपन्यास, लघु कथाएँ और निबंध दुनिया भर में व्यापक रूप से पढ़े जाते हैं. 

8 साल की उम्र में, उन्होंने कविताएं लिखना शुरू कर दिया और सोलह साल की उम्र तक उन्होंने कला कृतियों की रचना भी शुरू कर दी और छद्म नाम भानुसिम्हा के तहत अपनी कविताओं को प्रकाशित करना शुरू कर दिया। 1877 में उन्होंने ‘भिखारिनी’ और 1882 में कविताओं का संग्रह ‘संध्या संगत’ लिखा.

टैगोर कविता, गीत, कहानी, और नाटक कलम लिखते थे. टैगोर के लेखन में आम लोगों के जीवन, साहित्यिक आलोचना, दर्शन और सामाजिक मुद्दों के चित्रण शामिल हैं. उन्होंने महाकाव्य को छोड़कर तकरीबन सभी विधाओं में साहित्य रचना की. रवीन्द्रनाथ ने करीब ढाई हजार गीत लिखे और संगीतबद्ध किए. जीवन के अंतिम वर्षों में उनका झुकाव पेंटिंग की ओर हुआ और उन्होंने करीब 3 हजार पेंटिंग्स बनाई.  

उनकी प्रमुख रचनाएं गीतांजलि, गोरा एवं घरे बाईरे है. उनकी काव्य रचनाओं में अनूठी ताल और लय ध्वनित होती है. वर्ष 1877 में उनकी रचना 'भिखारिन' खासी चर्चित रही. बहुमुखी प्रतिभा के धनी टैगोर ने 'गीतांजलि' की रचना की, जिसके लिए 1913 में इन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया. 'गीतांजलि' दुनिया की कई भाषाओं में प्रकाशित किया गया. इसके साथ ही इन्होंने लोकप्रिय कहानियां काबुलीवाला, मास्टर साहब और पोस्ट मास्टर लिखीं, जिन्हें खूब पसंद किया गया. जबकि उपन्यास में इनकी रचनाएं गोरा, मुन्ने की वापसी, अंतिम प्यार और अनाथ आदि प्रमुख हैं, जिन्हें आज भी दुनियाभर में पढ़ा जाता है. अन्य प्रमुख रचनाये इस प्रकार है पूरबी प्रवाहिनी, शिशु भोलानाथ, महुआ, वनवाणी, परिशेष, पुनश्च, वीथिका शेषलेखा, चोखेरबाली, कणिका, नैवेद्य मायेर खेला, क्षणिका, गीतिमाल्य, कथा ओ कहानी इत्यादि.

बंगाल की आर्थिक दरिद्रता से दुखी होकर उन्होंने 100 पंक्तियों की कविता रच डाली. गुरुदेव ने 2,230 गाने लिखे थे. इनका संगीत संयोजन इतना अद्‍भुत है कि इन्हें रवींद्र संगीत के नाम से पहचाना जाता है. गुरुदेव का लिखा 'एकला चालो रे' गाना गांधीजी के जीवन का आदर्श बन गया.

बता दें कि उनकी बेटी रेणुका का निधन 12 वर्ष की आयु में हो गया था. वह टीबी की बीमारी से ग्रस्त थी. बेटी के आकस्मिक निधन से वह दुखी हुए. इस दौरान उन्होंने शिशु नामक कविता की रचना भी की.  

उनके लिखे 'जनगणमन' और 'आमार शोनार बांग्ला' जन-जन की धड़कन बने हुए हैं. गुरुदेव का संदेश था 'शिक्षा से ही देश स्वाधीन होगा संग्राम से नहीं'. कहना न होगा कि आज भी यह संदेश कितना प्रासंगिक है. उन्हें साहित्य के नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था किंतु इससे पूर्व सन 1915 में अंग्रेज शासन ने उन्हें नाइटहुड की उपाधि से अलंकृत किया. उन्हें बंगाल का सांस्कृतिक उपदेशक भी कहा जाता है. उनके व्यक्तित्व की छाप बांग्ला लेखन पर ऐसी पड़ी कि तत्कालीन लेखन का स्वरूप ही बदल गया.


रवींद्रनाथ टैगोर का जीवन परिचय: Biography of India's first Nobel laureate Gurudev Rabindranath Tagore
गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा लिखित गीतांजलि


सम्मान | Awards given to Gurudev Rabindranath Tagore


१९१३ ई. में रविंद्र्नाथ ठाकुर को उनकी काव्यरचना गीतांजलि के लिये साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला.

१९१५ ई. में उन्हें राजा जॉर्ज पंचम ने नाइटहुड की पदवी से सम्मानित किया था. १९१९ ई. में जलियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में उन्होंने यह उपाधि लौटा दी थी.


रवींद्रनाथ टैगोर 'नाईट हुड' यानि सर की उपाधि लौटा दी | Rabindranath Tagore had returned the title of 'Knight Hood' 


गुरुदेव ने आजादी से पूर्व आंदोलन में भी शिरकत की. इनके नेतृत्व में ही 16 अक्टूबर 1905 को बंग-भंग आंदोलन का आरम्भ हुआ था. इस आंदोलन के चलते देश में स्वदेशी आंदोलन को बल मिला. जब रोलेट एक्ट के चलते पंजाब स्थित जलियांवाला बाग में सैकड़ों निर्दोष लोगों की हत्या कर दी गई तो इस नरसंहार से क्षुब्ध होकर गुरुदेव ने अंग्रेजों द्वारा दी गई 'नाईट हुड' की उपाधि को लौटा दिया था. इस उपाधि के अंतर्गत व्यक्ति के नाम से पहले सर लगाया जाता था. गुरुदेव ने 7 अगस्त 1941 ई को अपने जीवन काल की अंतिम सांस ली. 


राजनीति में रवींद्रनाथ टैगोर का योगदान | Rabindranath Tagore's contribution to politics


रवींद्रनाथ टैगोर राजनीति में सक्रिय थे. वह भारतीय राष्ट्रवादियों के पूर्ण समर्थन में थे. इसके अलावा, वह ब्रिटिश शासन के विरोध में थे. उनके काम मैनास्ट में उनके राजनीतिक विचार शामिल हैं. उन्होंने कई देशभक्ति गीत भी लिखे. रवींद्रनाथ टैगोर ने भारतीय स्वतंत्रता के लिए प्रेरणा बढ़ाई. उन्होंने देशभक्ति के लिए कुछ काम लिखे. इस तरह के कार्यों के लिए जनता के बीच बहुत प्यार था. यहां तक कि महात्मा गांधी ने भी इन कार्यों के लिए अपना पक्ष रखा.


यह भी पढ़ें 


एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने