Gudi Padwa Celebration: गुड़ी पड़वा क्यों मनाया जाता है, जानिये गुड़ी पड़वा मनाने का कारण और महत्त्व | Why Gudi padwa is celebrated in Hindi

Gudi Padwa: Gudi Padwa importance in hindi, गुड़ी पड़वा कब कैसे और क्यों मनाया जाता है? गुड़ी पड़वा मनाने का कारण और इसका इतिहास | Why Gudi Padwa is celebrated in Hindi? Know the reason history importance in Hindi


Gudi padwa kyo manaya jata hai | Why Gudi padwa is celebrated in Hindi?
Gudi Padwa: गुड़ी पड़वा क्यों मनाया
जाता है, गुड़ी पड़वा मनाने का कारण

गुड़ी पड़वा मुख्य रुप से महाराष्ट्र में मनाया जाने वाला त्योहार है. गुड़ी पड़वा वसंत का त्योहार है जो मराठी और कोंकणी लोगों के लिए नए साल का प्रतीक है. ये महाराष्ट्र और गोवा के क्षेत्रों में चैत्र प्रतिपदा तिथि, शुक्ल पक्ष के हिंदू कैलेंडर के अनुसार मनाया जाता है. चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा पर नए हिंदू वर्ष की शुरुआत होती है. गुड़ी पड़वा को महाराष्ट्र में नए साल के तौर पर मनाया जाता है.

भारतवर्ष का सर्वमान्य सवंत विक्रम सवंत हैं. जिसका प्रथम महिना चैत्र माह होता हैं. इस माह के प्रथम दिन को गुडी पड़वा मनाया जाता हैं. यह दिन पूरे भारत में विभिन्न नामों, सांस्कृतिक मान्यताओं और उत्सवों के साथ मनाया जाता है. इस दिन विभिन्न अनुष्ठान होते हैं जो सूर्योदय से शुरू होते हैं और पूरे दिन चलते रहते हैं. गुड़ी पड़वा का दिन महाराष्ट्रीयन नव वर्ष के उत्सव का प्रतीक है. 

चैत्र ही एक ऐसा महीना है, जिसमें वृक्ष तथा लताएं फलते-फूलते हैं. शुक्ल प्रतिपदा का दिन चंद्रमा की कला का प्रथम दिवस माना जाता है. जीवन का मुख्य आधार वनस्पतियों को सोमरस चंद्रमा ही प्रदान करता है. इसे औषधियों और वनस्पतियों का राजा कहा गया है. इसीलिए इस दिन को वर्षारंभ माना जाता है. दक्षिण भारतीय राज्यों में, इस दिन को फसल दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो वसंत के मौसम के प्रारम्भ को दर्शाता है.


गुड़ी पड़वा केवल एक ही कारण से नहीं मनाया जाता हैं इस दिन कई घटनाएँ हुई थी जो कि हिन्दू मान्यताओं में काफी अहम योगदान रखती हैं. इसीलिए इस तारीख को मनाने पर कभी एक राय नहीं बनानी. इस दिन पुरे भारतवर्ष में कई त्यौहार और मान्यताये है. आइये जानते है इस त्यौहार को मनाने के कुछ कारण और महत्त्व. गुड़ी पड़वा के बारे में कुछ अज्ञात और सुंदर तथ्य हिंदी में देखें...

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गुड़ी पड़वा नाम का क्या अर्थ है ? | What is the meaning of Gudi Padwa name in Hindi?


गुड़ी पड़वा दो शब्दों में मिलकर बना हैं गुड़ी और पड़वा. 'गुड़ी' का अर्थ विजय पताका होता है. गुड़ी वो विजय ध्वज है जो अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतिक है. वहीं पड़वा का अर्थ प्रतिपदा तिथि होता है. गुड़ी पड़वा पर्व पर सुबह जल्दी उठकर एक बड़े डंडे से या एक बांस लेकर विजय पताका यानी झंडा बनाते हैं. इसके लिए डंडे पर कपड़ा या नई साड़ी जिसका उपयोग पहले नहीं किया हो, उसे लपेटा जाता है. उसके ऊपर चांदी, तांबे या पीतल का कलश, कटोरी, गिलास या लोटा उलटा रखा जाता है, और केसरिया रंग या रेशम के कपड़े या नई साड़ी से इसे सजाया जाता है. इसके बाद गुड़ी को गाठी, नीम की पत्तियों, आम की डंठल और लाल फूलों आदि का उपयोग करके सजाया जाता है.

फिर इसी विजय ध्वज को भगवान का रुप मानकर इसकी पूजा की जाती है, नए साल में बुराई पर अच्छाई की जीत हो एवं सबका भला हो इसके लिए भगवान से प्रार्थना की जाती है. गुड़ी को किसी ऊंचे स्थान पर लगाया जाता है, ताकि उसे दूर से भी देखा जा सके. यह प्रथा महाराष्ट्र और उससे जुड़े कुछ राज्यों में मनाई जाती हैं. इसके अलावा घर के दरवाजों पर आम के पत्तों से बना बंदनवार सजाया जाता है. ऐसी मान्यता है कि यह बंदनवार घर में सुख, समृद्धि और खुशि‍याँ लाता है.


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गुड़ी पड़वा कब मनाया जाता है ? | When Gudi Padwa is celebrated in Hindi?


फाल्गुन के जाने के बाद उल्लासित रूप से चैत्र मास का आगमन होता है. चहुंओर प्रेम का रंग बिखरा होता है. प्रकृति अपने पूरे शबाब पर होती है. दिन हल्की तपिश के साथ अपने सुनहरे रूप में आता है तो रातें छोटी होने के साथ ठंडक का अहसास कराती हैं. चैत्र का महीना हिंदू कैलेंडर का पहला महीना होता है. चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि हिंदू नववर्ष का पहला दिन होता है. इसी तिथि से चैत्र नवरात्रि का प्रारंभ भी होता है. इसी दिन से हिंदू नववर्ष नव संवत्सर का आरंभ होता है, इसी दिन गुड़ी पड़वा का पर्व भी मनाया जाता है.

भारतीय संस्कृति में गुड़ी पड़वा को चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को विक्रम संवत के नए साल के रूप में मनाया जाता है. हिन्दू पंचांग विक्रम सवंत का आरम्भ गुड़ी पड़वा से ही होता है. इसे वर्ष प्रतिपदा या उगादि भी कहा जाता है. ऐसा माना जाता है कि गुड़ी पड़वा यानि वर्ष प्रतिपदा के दिन ही ब्रम्हा जी ने संसार का निर्माण किया था. इसलिए गुड़ी पड़वा को नव संवत्सर यानि हिन्दू नववर्ष की शुरुआत माना जाता है, यही कारण है कि हिन्दू धर्म के सभी लोग इसे अलग-अलग तरह से पर्व के रूप में मनाते हैं.

गुड़ी पड़वा (मराठी-पाडवा) के दिन हिन्दू नव संवत्सरारम्भ माना जाता है. चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा या वर्ष प्रतिपदा या उगादि (युगादि) कहा जाता है. इस दिन हिन्दु नववर्ष का आरम्भ होता है. गुड़ी पड़वा के दिन को भारत में नए साल के तौर पर मनाया जाता है. महाराष्ट्र में इसे नये साल की शुरूआत के रूप गुड़ी पड़वा मनाई जाती है. इसी दिन कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश आदि में उगादी मनाया जाता है. इसी दिन चूंकि नवरात्र भी आरंभ होता हैं इसलिये इस पर्व का उल्लास पूरे देश में अलग-अलग रुपों में देखने को मिलता है, जो कि दुर्गा पूजा के साथ रामनवमी के दिन समाप्त होता है.


वर्ष 2022 में गुड़ी पड़वा त्यौहार

भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस बार गुड़ी पड़वा का त्यौहार 02 अप्रेल, मंगलवार को चैत्र मास की शुक्‍ल प्रतिपदा के दिन है. ऐसा माना जाता है की सभी युगों में प्रथम सतयुग की शुरुआत भी इसी तिथि से हुई थी. भारतीय कैलेंडर के मुताबिक चैत्र का महीना साल का पहला महीना होता है. 


गुड़ी पड़वा पर्व मुहूर्त

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में जिस दिन सूर्योदय के समय प्रतिपदा हो, उस दिन से नव संवत्सर आरंभ होता है.

यदि प्रतिपदा दो दिन सूर्योदय के समय पड़ रही हो तो पहले दिन ही गुड़ी पड़वा मनाया जाता है.

यदि सूर्योदय के समय किसी भी दिन प्रतिपदा न हो, तो प्रतिपदा के आरंभ व अंत होने वाले दिन नव-वर्ष मनाया जाता है.


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Happy Gudi Padwa
गुड़ी पड़वा की हार्दिक शुभकामनाये


गुड़ी पड़वा कैसे मनाया जाता हैं ? | How Gudi Padwa is celebrated in Hindi?


गुड़ी पड़वा महाराष्ट्र का मुख्य त्योहार है. गुड़ी पड़वा को महाराष्ट्र में नए साल के तौर पर मनाया जाता है.मराठी समुदाय के लिए गुड़ी पड़वा का विशेष महत्व होता है. यह पूरे महाराष्ट्र में धूम-धाम के साथ मनाया जाता है. गुड़ी पड़वा का पर्व महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और गोवा सहित दक्षिण भारतीय राज्यों में उल्लास के साथ मनाया जाता है. दक्षिण भारत में इस पर्व को उगादी के रूप में मनाया जाता है.

गुड़ी पड़वा पर सूर्योदय से पहले उठकर घर में सफाई की जाती है. लोग अपने घरों की सफाई कर रंगोली, आम के पत्तों की बंदनवार आदि से घर के आंगन व द्वार को सजाते हैं. आम के पत्तों की यह बंदनवार लोगों में खुशहाल जीवन की एक उम्मीद जगाती है. घर के आगे एक गुड़ी यानि झंडा रखा जाता है. इसके बाद गुड़ी को गाठी, नीम की पत्तियों, आम की डंठल और लाल फूलों से सजाया जाता है. इसी में एक बर्तन पर स्वास्तिक चिन्ह बनाकर उस पर रेशम का कपड़ा लपेट कर उसे रखा जाता है. पारंपरिक वस्त्र पहने जाते हैं. सूर्यदेव की आराधना की जाती है. इस दिन सुंदरकांड, रामरक्षास्त्रोत, देवी भगवती के मंत्रों का जाप भी किया जाता है. नव सवंत्सर की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है.

इस दिन लोग अपने घरों को आम के पत्तों की बंदनवार से सजाते हैं. खासकर आंध्र प्रदेश, कर्नाटक व महाराष्ट्र में इसे लेकर बहुत उल्लास होता है. आम के पत्तों की यह बंदनवार लोगों में खुशहाल जीवन की एक उम्मीद जगाती है. इस खास दिन पर लोग अपने-अपने तरीके से इस त्योहार को मनाते हैं. चूंकि इसी दिन नवरात्र भी आरंभ होते हैं इसलिये इस पर्व का उल्लास पूरे देश में अलग-अलग रुपों में देखने को मिलता है. ये त्योहार आपसी सौहार्द की भी पहचान है, जो लोगों के बीच भाईचारे को बढ़ाता है. समाज के लोग इस दिन मिल-जुलकर त्योहार को मनाते हैं.


जानिए कैसे मनाया जाता है गुड़ी पड़वा

  • इस दिन अरुणोदय काल के समय अभ्यंग स्नान करना चाहिए.
  • लोग घरों की सफ़ाई करते हैं. गांवों में गोबर से घर की लिपाई की जाती है.
  • चटख रंगों से रंगोली बनाने के साथ ही फूलों से घर को सजाया जाता है.
  • आज घर के मुख्य द्वार पर आम या न्यग्रोध के पत्तों का तोरण बनाकर लगाया जाता है.
  • प्रातःकाल स्नान आदि के बाद गुड़ी को सजाया जाता है. 
  • सूर्योदय के तुरंत बाद गुड़ी की पूजा आदि किया जाता है.
  • ब्राह्मणों को भोजन व दान पुण्य करें. प्याऊ की स्थापना करवाएं.
  • इस दिन आम तौर पर मराठी महिलाएं नौवारी लंबी साड़ी पहनती हैं, और पुरुष केसरिया या लाल पगड़ी के साथ कुर्ता-पजामा या धोती-कुर्ता पहनते हैं.
  • इस दिन सूर्यदेव की आराधना के साथ ही सुंदरकांड, रामरक्षा स्त्रोत और देवी भगवती के मंत्रों का जाप करने की भी परंपरा है.
  • इस दिन नए वर्ष का भविष्यफल सुनने-सुनाने की भी परंपरा है.
  • गुड़ी पड़वा पर मीठे पकवान जैसे श्रीखंड, पूरन पोली, खीर आदि बनाए जाते हैं.
  • शाम के समय लोग लेजिम नामक पारंपरिक नृत्य भी करते हैं.


शहर के मंदिरों में भव्य सजावट की जाती है. श्रद्धालुओं को मां के दर्शन और पूजा-अर्चन में कोई परेशानी न हो सके, इसके लिए मंदिर प्रबंधक समितियों ने सुरक्षा से लेकर सुविधा तक तमाम व्यवस्थाएं भी किये जाते हैं. इस दिन गुड़ी बनाकर अपने घर के बाहर लगाई जाती है, और नए साल में बुराई पर अच्छाई की जीत हो एवं सबका भला हो इसके लिए भगवान से प्रार्थना की जाती है.


घर पर ऐसे लगाएं तोरण

ध्वजा अर्थात गुड़ी के अलावा इस दिन घर के मुख्य दरवाजे पर आम के पत्ते या न्यग्रोध का तोरण भी लगाना चाहिए. घर पर तोरण लगाने से केतु के शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं और साल भर घर का वास्तु अच्छा रहता है. तोरण लगाते समय महेन्द्र, ब्राम्ही, दिगम्बर कुमार, सोम, रूरू भैरव और असितांग भैरव आदि शक्तियों का स्मरण करना चाहिए. तोरण लगाने के बाद इन देवताओं का ध्यान करना चाहिए और अपने घर की समृद्धि के लिये प्रार्थना करनी चाहिए. ये शक्तियां आपके घर के मुख्य द्वार की रक्षा करती हैं और घर के सभी दोषों को दूर करती हैं.


गुड़ी पड़वा के दिन कैसे बनाया जाता हैं गुड़ी ? | How is Gudi made on the day of Gudi Padwa in Hindi?

 

  • गुड़ी पड़वा के दिन घर के द्वार को सुंदर तरीके से सजाया जाता है. प्रवेश द्वार को आम के पत्तों तथा फूलो का तोरण बनाकर सजाया जाता है. इसके साथ ही घरो में तथा प्रवेश द्वार पे रंगोली बनाई जाती है. 
  • गुड़ी बनाने के लिए लकड़ी का एक दंड लें.
  • दंड को साफ धो लें और उसके उपर रेशमी कपड़ा या साड़ी बांधें.
  • एक नीम की टहली, आम के पांच पत्ते, एक फूलों की माला, एक शक्कर की माला को लगाएं और उसके उपर से तांबा पितल या चांदी का लोटा या गिलास रखें.
  • जिस स्थान पर गुड़ी लगानी हो उस स्थान को साफ और स्वच्छ कर लेना चाहिए.
  • गुड़ी रखने वाले स्थान पर पहले रंगोली बनाई जाती है, वहां एक पाट रखा जाता है, और उसके ऊपय वह दंड रखा जाता है.
  • तैयार गुड़ी को घर के दरवाजे पर, ऊंची छत पर या गैलरी में यानि किसी ऊँचे स्थान पर लगाई जाती है.
  • गुड़ी को अच्छी तरह से बांधकर और उस पर सुगंध, फूल और अगरबत्ती लगाकर गुड़ी की पूजा करनी चाहिए.
  • अगरबत्ती लगाने के बाद दीपक से गुड़ी की पूजा करते हैं.
  • फिर दूध-चीनी, पेड़े का प्रसाद अर्पित करना चाहिए.
  • लोग भगवान ब्रह्मा की पूजा अर्चना करते हैं, और उसके बाद गुड़ी फहराते हैं. गुड़ी फहराने के बाद भगवान विष्णु का आह्वान और पूजन किया जाता है.
  • दोपहर के समय गुड़ी को मीठा प्रसाद चढ़ाना चाहिए. इस दिन परंपरा के अनुसार श्रीखंड-पुरी या पूरनपोली का भोग लगाया जाता है.
  • शाम को सूर्यास्त के समय हल्दी-कुमकुम, फूल, अक्षत आदि अर्पित करके गुड़ी को उतारा जाता है.
  • इस दिन सभी हिन्दू एक-दूसरे को नववर्ष की बधाई देते हैं.

 

गुड़ी बनाने की सामग्री 

एक डंडा, रेशमी साड़ी या चुनरी, पीले रंग का कपड़ा, फूल, फूलों की माला, कड़वे नीम के पांच पत्ते, आम के पांच पत्ते, रंगोली, प्रसाद, पूजा सामग्री इत्यादि.


गुड़ी पड़वा के दिन क्या खास पकवान बनाया जाता है? | What special dish is prepared on the day of Gudi Padwa?


  • गुड़ी पड़वा के दिन खास तौर से हिन्दू परिवारों में पूरनपोली बनाने की परंपरा है. इसे घी और शक्कर के साथ खाया जाता है. वहीं मराठी परिवारों में इस दिन खास तौर से श्रीखंड बनाया जाता है.
  • इस दिन पूरन पोली या मीठी रोटी का खास महत्व है. इसमें जो चीजें मिलाई जाती हैं, वे हैं, गुड़, नमक, नीम के फूल, इमली और कच्चा आम. गुड़ मिठास के लिए, नीम के फूल कड़वाहट मिटाने के लिए और इमली व आम जीवन के खट्टे-मीठे स्वाद चखने का प्रतीक होती है.
  • इनके अलावा केसरी भात, वेजिटेबल भाकरवड़ी ,मूंग दाल तील बड़े, खरवस, पाल पायसम, आदि चीजें भी बनाई जाती हैं.
  • आंध्रप्रदेश में इस दिन प्रत्येक घर में पचड़ी का प्रसाद बनाकर बांटा जाता है. श्रीखंड में दही की खटास को शकर के संतुलन से कम कर मिठास भर दी जाती है. केसर, जायफल व इलायची का मिश्रण इसका जायका बढ़ाता है, रंग लाता है और महक भी बढ़ाता है. 
  • गुड़ी पड़वा के दिन नीम की पत्त‍ियां खाने का भी विधान है. इस दिन सुबह जल्दी उठकर नीम की कोपलें खाकर गुड़ खाया जाता है. इसे कड़वाहट को मिठास में बदलने का प्रतीक माना जाता है. 
  • अधिकतर लोग इस दिन कड़वे नीम की पत्तियों को खाकर दिन की शुरूआत करते हैं. कहा जाता है कि गुड़ी पड़वा पर ऐसा करने से खून साफ होता है, और शरीर मजबूत बनता है.


गुड़ी पड़वा क्यों मनाया जाता है? गुड़ी पड़वा मनाने का कारण| Why Gudi Padwa is celebrated in Hindi? Know Reason behind celebration


सनातन ( हिन्दू ) धर्म में चैत्र का महीना बहुत ही पवित्र और महत्वपूर्ण माना गया है. चैत्र का महीना हिंदू कैलेंडर का पहला महीना होता है. चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा पर नए हिंदू वर्ष की शुरुआत होती है. जिसके प्रारंभ की खुशी को लेकर इस पर्व को मनाया जाता है. इसी तिथि से चैत्र नवरात्रि का प्रारंभ भी होता है. इसी दिन से हिंदू नववर्ष नव संवत्सर 2079 का आरंभ होगा, इसी दिन गुड़ी पड़वा का पर्व भी मनाया जाता है. हिंदू धर्म में इस पर्व को लेकर खास मान्यताएं हैं. इसी दिन चूंकि नवरात्र भी आरंभ होते हैं, इसलिये इस पर्व का उल्लास पूरे देश में अलग-अलग रुपों में देखने को मिलता है. इस खास दिन पर लोग अपने-अपने तरीके से इस त्योहार को मनाते हैं. ये त्योहार आपसी सौहार्द की भी पहचान है, जो लोगों के बीच भाईचारे को बढ़ाता है. समाज के लोग इस दिन मिल-जुलकर त्योहार को मनाते हैं.


विभिन्न छेत्रो में विभिन्न मान्यताये 


  • मान्यता है कि सम्राट शालिवाहन ने मिट्टी की सेना बनाकर उनमें प्राण फूंक दिये और दुश्मनों को पराजित किया. उनके द्वारा शकों को पराजित करने के बाद लोगों ने घरों पर गुड़ी लगाकर खुशी का इजहार किया था. इसी दिन शालिवाहन शक का आरंभ भी माना जाता है.
  • इस दिन उज्जैयिनी की सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर विक्रम संवत का प्रवर्तन किया.
  • वीर योद्धा महाराज छत्रपति शिवाजी ने इस दिन को नए साल के रूप में भव्य समारोह के साथ जीत की 'विजयाध्वज' के प्रतीक के रूप मनाया था. इसलिए इस दिन छत्रपति शिवाजी की विजय की याद में भी गुड़ी लगाया जाता है.
  • मान्यता है के इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था. इसीलिए गुड़ी को ब्रह्मध्वज भी माना जाता है.
  • गुड़ी पड़वा को लेकर एक और मान्यता यह है कि इसी दिन भगवान् श्री राम ने दक्षिण के लोगों को बाली के अत्याचारों से मुक्त करवाया था. जिसकी ख़ुशी में लोगों में विजय पताकाएँ फहराई थी.
  • गुड़ी पड़वा का आध्यात्मिक महत्व ये है कि इस विशेष दिन पर, ये कहा जाता है कि भगवान राम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ 14 साल के लंबे वनवास के बाद अयोध्या वापस लौटे थे, और लंका में रावण को हराया था. भगवान राम द्वारा 14 वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या वापस आने की खुशी में भी गुड़ी पड़वा का पर्व मनाया जाता है.
  • मान्यता है कि सभी युगों में प्रथम सतयुग की शुरुआत भी इसी तिथि से हुई. 
  • ब्रह्म पुराण अनुसार इस विक्रम संवत में ब्रह्मा ने सृष्टि रचना की शुरुआत की थी. 
  • इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था. इसी दिन से ही रात्रि की अपेक्षा दिन बड़ा होने लगता है. 
  • पौराणिक कथाओं के अनुसार चैत्र नवरात्रि के पहले दिन आदिशक्ति प्रकट हुई थी. इसलिए इसी दिन नवरात्र भी आरंभ होते हैं.
  • इस दिन युधिष्ठिर ने राज्यारोहण किया था. 
  • महर्षि दयानन्द द्वारा आर्य समाज की स्‍थापना का दिवस इसी दिन हुआ था.
  • गुड़ी पड़वा पर ही सिखों के द्वितीय गुरु गुरु अंगद देव जी के जन्म हरीके नामक गांव में, जो कि फिरोजपुर, पंजाब में हुआ था.
  • गुडीपड़वा के दिन सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार संत झूलेलाल का प्रकट दिवस हुआ था.
  • माना जाता हैं कि प्राचीन भारत के महान गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री भास्कराचार्य ने अपने अनुसंधान के फलस्वरूप सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीने और साल की गणना करते हुए भारतीय पंचांग की रचना की. उस समय की गयी गड़ना आज के कालखंड की गडना में एक दम सटीक बैठती हैं.
  • मान्यता है कि गुड़ी लगाने से घर में समृद्धि आती है.
  • किसान रबी फसल की कटाई के बाद पुनः बुवाई करने की ख़ुशी में इस त्यौहार को मनाते हैं.
  • हिन्दुओं में पूरे वर्ष के दौरान साढ़े तीन मुहूर्त काफी शुभ माने जाते हैं, इनमें गुड़ी पड़वा भी एक है. इसके अलावा अक्षय तृतीया और दशहरा को पूर्ण और दिवाली को अर्द्ध मुहूर्त माना जाता है.
  • चैत्र मास में पेड़-पौधों पर नई पत्तियों आ जाती हैं तथा नया अनाज भी आ जाता है.


स्वास्थ्य के नज़रिये से भी गुड़ी पड़वा का काफी महत्व है. इस दिन बनाए जाने वाले व्यंजन चाहें आंध्र प्रदेश में बनाई जाने वाली पच्चड़ी हो, या फिर महाराष्ट्र में बनाई जाने वाली पूरन पोली या पोरन पोली, सभी स्वास्थ्यवर्द्धक होते हैं. माना जाता है कि खाली पेट पच्चड़ी के सेवन से चर्म रोग दूर होने के साथ-साथ स्वास्थ्य बेहतर होता है. वहीं पूरन पोली में गुड़, नीम के फूल, इमली और आम का उपयोग होता है जो स्वास्थ्य की दृष्टि से फायदेमंद होते हैं. इस दिन लोग सुबह में नीम की पत्तियां भी खाते हैं. माना जाता है कि इससे रक्त शुद्ध होता है.


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विभिन्न स्थानों में गुड़ी पड़वा - देश में अलग-अलग जगहों पर गुड़ी पड़वा | Know the different form Gudi Padwa in different places of India in Hindi


गुड़ी पड़वा का पर्व मुख्य रूप से महाराष्ट्र के लोग हिन्दू नववर्ष शुरू होने की खुशी में मनाते है. गुड़ी पड़वा का त्योहार महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और गोवा सहित कई दक्षिण भारतीय राज्यों में मनाया जाता है. गोवा और केरल में कोंकणी समुदाय के लोग इसे संवत्सर पड़वों नाम से मनाते हैं. वहीं कर्नाटक में इसे युगादी पर्व के नाम से मनाया जाता है. इसके अलावा आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में गुड़ी पड़वा को उगादी नाम से मनाया जाता है.

ब्रह्म पुराण अनुसार इस विक्रम संवत में ब्रह्मा ने सृष्टि रचना की शुरुआत की थी. यह भी मान्यता है की इसी दिन से ही सतयुग की शुरुआत मानी जाती है. इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था. इस दिन से चैत्र नवरात्र की शुरुआत भी मानी जाती है. इसी दिन को भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ था, और पूरे अयोध्या नगर में विजय पताका फहराई गई थी. इसी दिन से ही रात्रि की अपेक्षा दिन बड़ा होने लगता है. 


  • महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा प्रमुख त्योहारों में से एक है, जो की नए साल को भी दर्शाता है.
  • गोवा और केरल में कोंकणी समुदाय इसे 'संवत्सर पड़वो' नाम से मनाते हैं.
  • कर्नाटक में यह पर्व 'युगादी' नाम से मनाया जाता है.
  • आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में गुड़ी पड़वा को 'उगादी' (Ugadi) नाम से जाना जाता है.
  • कश्मीरी हिन्दू इस दिन को नवरेह (Navreh) और सिंध में 'चेटीचंड' (Cheti Chand) के तौर पर मनाते हैं.
  • मणिपुर में इस दिन को सजिबु नोंगमा पानबा या मेइतेई चेइराओबा (Sajibu Cheiraoba) के नाम से जाना जाता है.
  • केरल में 'विशु' को लुनिसोलर के सौर चक्र के रूप में मनाया जाता है, जिसे महीने का पहला दिन कहा जाता है.
  • सिख धर्म में, वैसाखी को खालसा के जन्म के रूप में मनाया जाता है.
  • इसी दिन से चैत्र नवरात्र (Chaitra Navratri) की भी शुरुआत तथा साथ ही हिन्दू नव वर्ष (Hindu Nav Varsh) की शुरुआत भी इसी दिन से होती है, जिसे नव संवत्सर कहते हैं.


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नववर्ष को भारत के अलग अलग हिस्सों में अलग अलग तरीको के अनुसार मनाया जाता है. नववर्ष को प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग नामों से जाना जाता है. हिन्दू धर्म में चैत्र माह से ही नववर्ष की शुरुआत माना जाता है और इसे नव संवत्सर के रूप में जाना जाता है. इस दिन को गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेह, उगाडी, चेटीचंड, चित्रैय तिरुविजा आदि नामो से जाना जाता है.

गुड़ी पड़वा के दिन, भक्त भगवान ब्रह्मा की पूजा और अर्चना करते हैं जो की ब्रह्मांड के परम निर्माता हैं. हिन्दू शास्त्रों और किंवदंतियों के अनुसार माना जाता है कि उन्होंने गुड़ी पड़वा के दिन ब्रह्मांड का निर्माण किया था. इसलिए गुड़ी पड़वा के दिन, भगवान ब्रह्मा की पूजा, अर्चना की जाती हैं.

महाराष्ट्र में इस दिन को भव्यता और उत्साह के साथ मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि इस त्योहार सभी बुराईयों को दूर करता है और सौभाग्य और समृद्धि को भी आकर्षित करता है. साथ ही कहा जाता है कि गुड़ी पड़वा के दिन सारी बुराईयों का नाश हो जाता है. वहीं, व्यक्ति के जीवन में सुख समृद्धि का आगमन होता है.

इसी दिन से चैत्र नवरात्रि शुरू होता है. साथ ही हिन्दू नव वर्ष की शुरुआत भी इसी दिन से होती है. इसी दिन से सतयुग की शुरुआत मानी जाती है तथा वेदो के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था. इसी दिन को भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ था, और पूरे अयोध्या नगर में विजय पताका फहराई गई थी. इसी दिन से ही रात्रि की अपेक्षा दिन बड़ा होने लगता है. गुड़ी पाड़वा के दिन भगवान् ब्रम्हा और सूर्यदेव की आराधना को महत्व दिया जाता है. सूर्यदेव के अलावा इस दिन सुंदरकांड, रामरक्षास्त्रोत, देवी भगवती के मंत्रों का जाप भी किया जाता है.

इस दिन बर्तन पर भी स्वास्तिक का चिन्ह बनाकर रखा जाता है. लोग इस दिन पारंपरिक वेषभूषा धारण करते हैं. किसान रबी की फ़सल की कटाई के बाद पुनः बुवाई करने की ख़ुशी में इस त्यौहार को मनाते हैं. अच्छी फसल की कामना के लिए इस दिन वे खेतों को जोतते भी हैं. 


Know the different form Gudi Padwa in different places of India in Hindi


जानिये गुड़ी पड़वा से जुड़ी पौराणिक कथा | Religious and Historical Significance of Gudi Padwa in Hindi


प्रभु श्री राम द्वारा बलि का वध 

दक्षिण भारत में गुड़ी पड़वा का त्यौहार काफी लोकप्रिय है. दक्षिण भारत में गुड़ी पड़वा की लोकप्रियता का कारण इस पर्व से जुड़ी कथाओं से समझा जा सकता है. पौराणिक मान्यता के मुताबिक सतयुग में दक्षिण भारत में राजा बालि का शासन क्षेत्र हुआ करता था. जब भगवान श्री राम को पता चला की लंकापति रावण ने माता सीता का हरण कर लिया है तो उन्हें वापस लाने के लिये उन्हें रावण की सेना से युद्ध करने के लिये एक सेना की आवश्यकता थी. पता लगाने के दौरान दक्षिण भारत में आने के बाद उनकी मुलाकात सुग्रीव से हुई. सुग्रीव ने बालि के कुशासन से प्रभु श्रीराम को अवगत करवाते हुए अपनी असमर्थता जाहिर की. इसके बाद भगवान श्री राम ने बालि का वध कर दक्षिण भारत के लोगों को उसके आतंक से मुक्त करवाया. मान्यता है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का ही वो दिन था. इसी कारण इस दिन गुड़ी यानि विजय पताका फहराई जाती है.


सृष्टि के निर्माण का दिन

कहते है कि गुड़ी पड़वा के दिन ही यानी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना का कार्य शुरू किया था. यही कारण है कि इसे सृष्टि का प्रथम दिन भी कहते हैं. इसीलिए गुड़ी को ब्रह्मध्वज भी माना जाता है.


आदिशक्ति प्रकट हुई थी 

पौराणिक कथाओं के अनुसार चैत्र नवरात्रि के पहले दिन आदिशक्ति प्रकट हुई थी. भारतीय कैलेंडर के मुताबिक चैत्र का महीना साल का पहला महीना होता है. इसे हिंदू कैलेंडर का पहला दिन भी कहते है. इस दिन नवरात्र घटस्थापन, ध्वजारोहण, संवत्सर का पूजन इत्यादि किया जाता है. इसी दिन चूंकि नवरात्र भी आरंभ होते हैं, इसलिये इस पर्व का उल्लास पूरे देश में अलग-अलग रुपों में देखने को मिलता है.


शालिवाहन कथा 

एक प्राचीन कथा शालिवाहन के साथ जुड़ी हुई है. पौराणिक कथा के मुताबिक शालिवाहन ने मिट्टी की सेना बनाकर उनमें प्राण फूंक दिये और दुश्मनों को पराजित किया. इसी दिन शालिवाहन शक का आरंभ भी माना जाता है. इस दिन लोग आम के पत्तों से घर को सजाते हैं. आंध्र प्रदेश, कर्नाटक व महाराष्ट्र में इसे लेकर काफी उल्लास होता है.


हिंदू पंचाग की रचना का काल

पौराणिक ग्रंथो के अनुसार मान्यता यह हैं कि प्राचीन भारत के महान गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री भास्कराचार्य ने अपने अनुसंधान के फलस्वरूप सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीने और साल की गणना करते हुए भारतीय पंचांग की रचना की.


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